खाली मिठाईयाँ

कभी आसमाँ से बूंदे बरसती तो पूरा नुक्कड़ ,पूरा मोहल्ला करीब करीब हो तैरने लगता, जरा से सावन पे मुस्कराहट ज्यादा जोर लगाती नूर ही नूर था

अब तन का लिबास उतर कर मन पर आ चड़ा है  सच क्या है एहसास कहाँ है चश्मे से भी नज़र नहीं कर पाते,सब छुप सा गया है अपनी अपनी दीवारों में अकेले सजे बैठे हैं

बारिश भी बरसती है तो अलग अलग बूँद लिए अलग अलग चेहरों को धोने को ,शाम तक कई तस्वीरे बन जाती हैं ,कुछ अखबारों में भी छा जाती है ओर मुबारक मुबारक कहते कहते अपनी अपनी मिठाईयाँ खाते हैं , बेहद मीठी

पर खाली रिश्तों के ,खाली एहसासों की , ”खाली मिठाईयाँ”

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